संपादक मोहम्मद आमीन
भोपाल । मध्य प्रदेश पुलिस विभाग में कार्यरत वह कर्मचारी, जो नौकरी के दौरान अपने कर्तव्यों से गैरहाजिर रहते हैं, उनके खिलाफ अब विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी। मध्य प्रदेश पुलिस के डायरेक्टर जनरल (DG) विवेक जौहरी ने इस आशय के आदेश जारी कर दिए हैं।
भोपाल बुलेटिन डॉट कॉम को मिली जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश के DG विवेक जौहरी द्वारा जारी किए गए आदेश के मुताबिक मध्य प्रदेश सिविल सेवाएं (अवकाश) नियम-1977 में वर्णित नियम-24 में निहित प्रावधानों के अनुरूप अवकाश समाप्ति के बादे स्वेच्छा से कार्य से अनुपस्थित रहने वाला शायकीय कर्मचारी अनुशासनिक कार्यवाही का भागी होगा। मध्य प्रदेश पुलिस रेग्यूलेशन के पैरा क्रमांक 214 से 217 में मुख्य आरक्षकों या आरक्षकों को दंड देने की शक्ति निहित है, एवं मध्य प्रदेश सिविल सेवाल (वर्गीकरण नियंत्रण तथा अपील) नियम 1966 में अधीनस्थ शासकीय सेवकों को शास्ति देने का प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 311 (2) के अंतर्गत नैसर्गिक न्याय के सिद्धातों की यह अपेक्षा है कि किसी भी कर्मचारी को दंडित किए जाने के पूर्व उसे अपने बचाव का अवसर दिया जाए। इस प्रक्रिया में कर्मचारियों का स्पष्टीकरण लिया जाना अथवा कारण बताओ नोटि जारी कर तामीन कराया जाना अथवा शायकीय सेवक को, सजा के पूर्व समक्ष में, सुना जाना चाहिए। बचाव का अवसर देने के बाद ही रिकार्ड एवं गुणदोष के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
डीजी विवेक जौहरी के आदेश के मुताबिक पुलिस रेग्यूलेशन के पैरा 190 में 21 दिन की गैरहाजिरी के बाद नामावली से पृथक करने का प्रावधान है, किन्तु इसका आशय यह नहीं है कि पृथ्रक करने की कार्यवाही विभागीय जांच किए बिना ही की जाएगी। यदि शायकीय सेवक परिवीक्षाधीन अवधि पूर्ण कर स्थायी हो चुका है, तो नामावली सूची के नाम पृथक करने के लिए नियमित विभागीय जांच ही की जाएगी। प्रत्येक प्रकरण में तथ्यों एवं रिकार्ड के आधार पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय लिया जाएगा। किन्तु दंड स्वरूप से पृथक करते हुए नामावली से पृथक करने की कार्यवाही की जा सकती है। परिवीक्षाधीन शासकीय सेवक को लगातार कर्तव्य से गैरहाजिरी के लिए सेवा मुक्त भी किया जा सकता है।
डीजी विवेक जौहरी के आदेश के मुताबिक 60 दिवस से अधिक, अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारियों की विभागीय जांच सुनिश्चित की जाए। इस संबंध में समय-समय पर पूर्व में जारी विपरीत प्रभाव वाले परिपत्र प्रभाव शून्य समझे जाएं। 60 दिन से कम अवधिक की अनुपस्थिति के प्रकरणों का निराकरण सामान्यतया ओ.आर (अर्दली रूम) अथवा समक्ष में सुनवाई अथवा कारण बताओ नोटिस जारी करके किया जा सकता है। संबंधित अनुशासनिक अधिकारी प्रकरण के तथ्य एवं परिस्थितियों के दृष्टिगत विभागीय जांच भी आदेशित कर सकता है।
डीजीपी विवेक जौहरी के आदेश के मुताबिक सामान्यतया एक सप्ताह से अधिक अनाधिकृत अनुपस्थिति के मामलों में शासकीय सेवक के निवास पते पर सूचना पत्र भेजना चाहिए कि वह तुरंत उपस्थित हो और 7 दिवस में कारण बताएं कि उनकी अनाधिकृत अनुपस्थिति को पेंशन, उपादान आदि समस्त उद्देश्यों के लिए क्या न ‘सेवा में व्यवधान’ माना जाए और क्यों न ‘ मूलभूत नियम 18’ के अंतर्गत निर्णय लिया जाए। निर्धारित अवधि में उचित कारण न बता सकने पर उनकी सेवा में व्यवधान मानते हुए अनुपस्थित अवधि का तद्नुसार निराकरण करते हुए सेवा पुस्तिका में लेख (इंद्राज) करान चाहिए। यदि आवश्यक हो तो मध्य प्रदेश मूलभूत नियत भाग-एक के नियम-18 और भाग-दो के नियम-6 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। आदतन अनुपस्थित होने वाले ऐसे कर्मचारी, जिन्हें पूर्व में सुधार के लिए अवसर दिया गया हो, यदि पुन: अनुपस्थित रहते हैं तो मध्य प्रदेश पुलिस रेग्यूलेशन एवं मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण नियंत्रण तथा अपील) नियम 1966 के नियम-7 के अनुसार विभागीय जांच संस्थित की जानी चाहिए।
डीजीपी विवेक जौहरी के आदेश के मुताबिक यदि किसी कर्मचारी का अवकाश स्वीकृत है और अवकाश समाप्ति के उपरांत वह विलंब से कर्तव्य पर उपस्थित होता है, तो ऐस कर्मचारियों को गैरहाजिर अवधि का यदि अर्जित अवकाश स्वीकृत किया जा रहा है, तो उसे ‘निंदा’ के दंड से दंडित किया जाना उचित नहीं है। ‘अवकाश स्वीकृति’ और सजा दोनों एक साथ देना विधि सम्मतनहीं है। उपयुक्त प्रकरणों में मध्य प्रदेश सिविल सेवाएं (अवकाश) नियम 1977 के नियम-24 अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। बिना अवकाश लिए स्वेच्छापूर्वक गैरहाजि होने वाले अथवा स्वयं को निर्धारित प्रक्रिया पूर्ण किए बिना ही ‘सिक’ घोष्ज्ञित कर कर्तव्य से अनुपस्थिति अथावा कर्तव्य से स्वेछा पूर्वक अनुपस्थित हो जाने वाले शासकीय सेवकों के प्रकरणों में कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। पुलिस अधिनियम एवं मध्य प्रदेश पुलिस रेग्युलेशन के अनुसार स्वेच्छा से ‘स्वयं को कर्तव्य से हटा लिया जाना’ गंभीर कदाचरण है। प्रशिक्षण, कानून तथा चुनाव आदि महत्वपूर्ण ड्यूटी से अनुपस्थित होने वाले कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। प्रशिक्षण से बचने वाले और प्रशिक्षण संथान से गैरहाजिर होने वाले शासकीय सेवकों के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाना चाहिए।
डीजीपी विवेक जौहरी के आदेश के मुताबिक एक इकाई से दूसरी इकाई में स्थानांतरण, कानून व्यवस्था, चुनाव ड्यूटी और प्रशिक्षण से ठीक पूर्व/ठीक पश्चात/कार्यमुक्ति के पश्चात गैरहाजिर होने की स्थिति में अनुशासन बनाए रखने के एिल, विभागीय जांच की जाना अनुसार कायम रखने के लिए उचित है। ऐसे प्रकरणों में विभागीय जांच न किया जाना और अर्जित अवकाश की स्वीकृति का पर्याप्त आधार नहीं है। बीमारी के संदर्भ में संदेह होने की स्थिति में मेडिकल बोर्ड का प्रमाण पत्र अनिवार्य किया जा सकता है। मात्र बीमारी का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के आधार पर ही आवश्यक स्वीकृति का दावा नहीं किया जा सकता है। ऐसे ‘बीमारी शासकीय सेवकों की मैदानी क्षेत्रों में या थाने में या प्रतिष्ठा के पद पर पदस्थापना करना भी उचित नहीं है। ऐसे कई प्रकरण सामने आए हैं जिसमें पुलिस शासकीय सेवा स्थानांतरण हो जाने या उन्हें कोई कड़ी ड्यूटी बताए जाने के बाद स्वयं को ‘बीमार’ बताकर कर्तव्य से अनुपस्थित हो गया और इस दौरान उसने को कोर्ट के इस विभागय आदेश को चुनौती देते हुए याचिका भी प्रस्तुत की या मुख्यालय या शासन में घूमता पाया गया, ऐसे गैरहाजिर प्रकरणों में आवश्यक रूप से विभागीय जांच की जाए।
डीजीपी विवेक जौहरी के आदेश के मुताबिक इसी प्रकार कुछ पुलिस शाश्सकीय सेवा, कोर्ट में वारंट जारी होने की जानकारी मिलते ही या स्वयं के विरुद्ध अपराध पंजीबद्ध होने की सूचना मिलते ही अनुपस्थित हो जाते हैं। ऐसे प्रकरण में आवश्यक रूप से विभागीय जांच की जानी चाहिए। ऐसे अधिकारी/कर्मचारी की आमद पश्चात् थाने/अनुविभाग में पदस्थापना नहीं की जानी चाहिए। वरिष्ठ एवं अनुभवी/दीर्घ सेवाकाल के शासकीय सेवकों के परिवीक्षाधीन/रंगरूट/कम सेवाकाल वाले शासकीय सेवकों के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदारी एवं कत्र्तव्यनिष्ठाा की अपेक्षा है। अत: तुलनात्मक रूप से रंगरूट/परिवीक्षाधीन/कम सेवा अवधि वाले स्टॉफ के साथ उदारता और वरिष्ठों के द्वारा समान प्रकार के कदाचरण में सख्ती से नियम लागू किया जाना चाहिए।
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